नीचे दिए गए चित्र में जो आप नाश्ते, व दोपहर का खाना, रात्रि के खाने का मीनू देख रहे है,
 ये किसी इंजीनियरिंग कॉलेज, व ऐसे कोई कॉलेज का नहीं है जहां बड़े बड़े उद्योगपति, या बड़े अधिकारियों के बच्चे पढ़ते हो, ये खाने की समय सारिणी आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कुमारगंज अयोध्या के रोहिणी छात्रावास की है(2016-20), जहां लघु व सीमांत किसान के बच्चे अपने मां बाप के सपनों को साकार करने आते है, इसी समय विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा डॉक्टर सुरेश प्रताप सिंह (डॉक्टर एस पी सिंह डेयरी वाले) को रोहिणी छात्रावास के सहायक छात्रावास अधीक्षक की जिम्मेदारी दी गई, जिम्मेदारी मिलते ही सर ने छात्रावास का निरीक्षण किया, जैसे कि सभी अधिकारी नई जिम्मेदारी मिलने पे करते है, सर भी वैसे किए, कुछ दिन बाद सर के पास शिकायत जाने लगी कि पैसा ज्यादा लगता है, उसके हिसाब से खाने की गुणवत्ता ठीक नहीं है, फिर क्या था, सर तुरत एक्शन मोड में आ गए, सामान्य सामग्री की दुकान , मेस सचिव, सब्जी की दुकान, अंडे की दुकान, दूध वाला अब बदल दिए गए, इसके बाद भी सर के पास शिकायतें जाती रही, फिर 

 जो भी मजदूर सब्जी ले के आए सर स्वयं ही उसका वजन कराए, सुबह सुबह आकर समान निकलते समय चेक करना , सिलेंडर चेक करना सर के दिनचर्या में आ गया, इसके बाद फिर क्या ही था, खाने की गुणवत्ता भी सही हुई, व डाइट भी कम है, वास्तव में सर जैसा प्रोफेसर होना मुश्किल है,बिना किसी दिखावा के छात्रों के हित में सदैव काम करते रहते थे, एक बार की बात है, विवेक कुमार नाम का छात्र मेस में खाना खा रहा था, उसके ऊपर अज्ञात कारण से पंखा गिर जाने के कारण उसको चोट लग गई , किसी लड़के ने सर को फोन पे इस घटना के बारे में बताया, विवेक के दोस्त जब तक उसको वर्मा डॉक्टर के यहां ले जाने के लिए तैयार होते तब तक सर बाइक टॉर्च लेकर छात्रावास पहुंच गए, तुरंत अपने ही बाइक से विवेक को लेकर वर्मा डॉक्टर के यहां ले गए व खुद के पैसे से दवा कराई, जब विवेक को लेकर सर छात्रावास आए तो छात्रों की काफी भीड़ इकट्ठा थी, विवेक को उसके कमरे में ले जाया गया, मरहम पट्टी दवा के बाद भी विवेक के सर में कही से खून लगा रह गया था, जब मैं पहुंचा तो देखा सर खुद अपने हाथो से विवेक का सर साफ कर रहे थे ठीक उसी प्रकार जैसा एक बाप अपने बच्चे का करता है, सर ने बहुत से लड़कों की फीस अपने जेब से भरी है, एक बार सर को पता चला कि एक बच्चे के पिता जी नहीं है, और उसके पास फोन नहीं है, सर फोन खरीदकर धीरे से उस बच्चे को देने जा रहे थे, तभी मैने देख लिया, कि सर ये क्या है, कहा ले जा रहे है, उस समय सर चिल्ला पड़े तुमसे क्या मतलब रूम में जाओ पढ़ो लिखो, मुझे कुछ अजीब लगा कि सर ऐसा कभी बोलते नहीं थे, फिर भी मैं सीधे अपने रूम में चला गया, कुछ दिन बाद सर से मैं मिला तो सर ने सारी बात बताई लेकिन किसी से शेयर न करने की शर्त पर,लेकिन आज शेयर करना पड़ रहा है, अभी कोई भी पुराना छात्र सर से मिलने जाए तो सर सबसे पहले यही पूछेंगे कि कोई सवारी है या पैदल हो, यदि छात्र बोल दिया सर पैदल हु तो फ़िर सर का यही जवाब होता है कि बेटा तुम वही रुको मैं आता हु वही, फिर सर वहा मिलने पहुंच जाते है,वास्तव में सर जैसा प्रोफेसर होना मुश्किल है, आज के युग में,आज सर की विश्वविद्यालय में एक अलग ही पहचान है, NDUAT MASTI टीम सर के अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती है।

पंकज यादव की कलम से 

Nduat Masti 

#follower #highlightsシ